आज 24 जनवरी एक ठंडी सुबह रविवार अवकाश का दिन फुर्सत के पल चाय के प्याले के साथ रजाई में बैठ कर समाचार पत्र पद रहा था कि एक खबर पर ध्यान गया की बुंदेलखंड में जब बच्चे (इस देश का भविषय) अपनी माँ से रोटी मांगते हैं तो माँ उन्हें चांटे मरकर का सुला देती हैं क्योकि उन लोगों के पास इतना अनाज भी नहीं है की वो अपने बच्चो को दो वक़्त की रोटी खिला सकें अभी कुछ समय पहले एक न्यूज़ चैनल में देखा था कि आदिवासी क्षेत्रों में आज भी माताएँ अपने बच्चों को घास गर्म कर के उस पर नमक डाल कर खाने को देती है और जहाँ आज भी चूहे मार कर खाए जाते हैं|। 2 दिन बाद 26 जनवरी है भारत का गड्तंत्र दिवस मुझे भारत के संविधान को पढ़ने है का सौभाग्य नही मिला लेकिन मैं ये सोचता हूँ की 1950 में जब यह बनाया गया था तो इसे बनाने वाले इस देश के हर बच्चे, हर नागरिक को रोटी का अधिकार भी दे देते तो इस तरह की ख़बरें शायद अख़बारों में न छपती। इस देश में विकास की बड़ी बड़ी बातें दावे आकड़ों में किये जाते हैं लेकिन दुर्भाग्य की आजादी के 68 साल बाद भी इस देश के बचपन को भूखा रहना पड़ता हैं। जहाँ भगवन श्री कृष्ण कान्हा जी को 56 भोग का प्रशाद चढ़ाया जाता है और उन्ही के बालसखा को एक समय की रोटी भी नहीं मिलती। देश में कितनी सरकारें आई और चली गई गरीब को रोटी देने का वायदा तो सब ने किया लेकिन शायद सब ही समझदार थे क्योकि अगर एक बार मैं ही वायदा पूरा कर दिया तो अगली बार फिर क्या वायदा करेंगे। लेकिन शायद हर कार्य के लिए सरकारों को दोष देना भी ठीक नहीं है क्योकी उनका काम तो शासन चलाना होता है किसी की भूख मिटाना नहीं।
हमारे देश के बड़े बड़े मंदिरों मैं धन दौलत के भंडार भरे हुए हैं एक ऐसे बाबा जिन्हीने सारा जीवन भिक्षा मांग कर अपना पेट भरा आज उन्हें सोने और हीरे के सिंघासन पर बिठाया हुआ है क्या इन मंदिरों में बैठे हुए देवी देवताओं के दिल इन भूखे रहने वाले लोगों को देख कर दुखी नहीं होते या शायद इन मंदिरों के बाहर भी दुनिया है इन्हे पता ही नहीं होता मैं प्रार्थना करता हूँ इन बड़े बड़े मंदिरों के संचालकों से कृपा कुछ दिन के लिए इन देवी देवताओं को अवकाश दें ताकि वो मंदिरों से बाहर आकर ये देख सकें कि बिना रोटी के लोग कैसे जीवन बिताते हैं तो शायद अपनी जमा पूँजी का कुछ भाग वे इनके उद्धार के लिए दे दें।
भारत के धर्म गुरु जो राजाओं की तरह अपना जीवन बिताते हैं अभी 2 साल पहले में मई के महीने में शिमला घूमने गया था वहां एक गुरु जी के बड़े बड़े बैनर लगे हुए थे जिनका निवास स्थान तो दिल्ली में है लेकिन जून से लेकर सितम्बर तक इनके सत्संग के प्रोग्राम शिमला, कुल्लू, मनाली, धर्मशाला आदि हिल स्टेशन पर फिक्स थे ताकि दिल्ली की गर्मी से छुटकारा मिल सके घूमना भी हो जाये और काम भी चलता रहे। इनमे से कई धर्म गुरुओं को तो शायद यह भी पता नहीं होगा की उनके पास इस देश में कुल कितने आश्रम या कितनी पॉपर्टी है इन सभी धरम गुरुओं से विनती है की अपने संसाधनो से थोड़ा सा इन गरीबो के लिए भी खर्च करें क्योकि खाली सत्संग से पेट नहीं भरता जीने के लिए तो रोटी ही चाहिए।
हमारे देश मैं बहुत बड़े बड़े दानी और धार्मिक लोग रहते हैं तभी तो भारत को महान देश कहा जाता है हम लोग अमरनाथ जी की यात्रा पर जाने वाले भक्तो के लिए हजारों फूट ऊंचाई परलंगर लंगा लगा देते हैं शिव का कावड़ लाने वाले भक्तो के आराम और खाने के लिए सड़कों पर ही सब व्यवस्था कर लेते हैं। उत्तराखंड में परलय आने पर हजारों ट्रक सामान रातों रात भेज देते हैं अगर हम इस महान देश के सभी नागरिक हर महीने सिर्फ रुपये 10, 20, 50 भी जोड़े तो हर माह इतने फंड्स हो जायेंगे की सब की न सही कुछ लोगों की रोटी का प्रबंध तो हम कर ही सकते हैं तो इस 26 जनवरी को क्यों न इस अच्छे काम की शुरुआत करें।
Sari duniya de wich koi na gareeb hove...
ReplyDeleteaise na koi hove jinu roti na naseeb hove...
rukhi misi sab nu khuwain baba nanka...