कर्म
इस दुनिया मैं जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो कौन कौन खुशियां मनाता है उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी परिवार के सदस्य और रिश्तेदार लेकिन कोई एक ऐसा भी होता है जो उस समय रोता है वह बच्चा जो जन्म लर्ता है लेकिन जब कोई व्यक्ति इस दुनिया से जाता है तो इसका उल्टा होता है यानि जाने वाला तो चला जाता है समाज और रिश्तेदार रोते हैं। इस आने और जाने के बीच के समय में इंसान जो कार्य करता है वह उसके कर्म कहलाते हैं कहते हैं के कर्म इंसान के दुनिया छोड़ने पर भी उसका पीछा नहीं छोड़ते और वह मरने के बाद भी अपने अच्छे या बुरे कर्मो के लिए याद किया जाता है कहा जाता है कि जैसे हजार गायों में भी बछड़ा अपनी माँ को पहचानकर उसके पास पहुँच जाता है ठीक उसी तरह इंसान के कर्म भी उसे पहचान कर उसके पीछे चलते रहते हैं। इंसान की प्रतिष्ठा का पता इससे नहीं चलता की उसकी खुशियों में उसके साथ कितने लोग चलते हैं बल्कि उसकी अंतिम यात्रा मे उसके पीछे कितने लोग चलते हैं। यह समाज उन लोगों को अधिक समय तक याद नहीं रखता जिन्होंने समाज से अधिक से अधिक लिया है चाहे वह कोई बड़ा नेता, अभिनेता या कोई उधोग पति हो बल्कि उन्हें याद करता है जिसने समाज को कुछ दिया है। हम आज भी याद करते हैं लाला लाजपत राय, सुभाषचन्दर बोसे, चन्दरशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह जैसे वीरों को जिन्होंने समाज से कोई पद, धन दौलत नहीं लिया बल्कि अपने प्राण दे कर भी समाज को देश वासियों को आजादी का उपहार दिया।
एक व्यक्ति की अर्थी जा रही थी लोगों की भीड़ में कुछ भिखारी भी रोते हुए चलने लगे एक व्यक्ति ने पुछा की आप लोग क्यों रो रहे हैं तो उन्होंने कहा कि सेठ जी जब भी मंदिर आते थे हमे सौ सौ रूपये देते थे उन भिखारियों को उस जाने वाले व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं पता उन्हें इस लिए रोना आ रहा है की अब उन्हें सौ रूपये कौन देगा। बचपन में एक कहानी सुनी थी एक व्यक्ति शराब पी कर रोज शाम को अपने घर के बाहर बैठ जाता था और आते जाते लोगों को गालियां देता था जब उसका अंतिम समय आया तो उसने अपने बेटे से कहा की मैंने सारा जीवन बुरे कर्म किये हैं शराब पी लोगों को गालियां दी लोग सारा जीवन मुझे कोसते रहे बेटा कुछ ऐसा कर दे जो मरने के बाद लोग मुझे अच्छा कहें इतना कह कर वह तो मर गया लेकिन लड़के के लिए यह समस्या थी की ऐसा क्या करूँ की लोग मेरे पिता को अच्छा कहें पिता की अंतिम इच्छा तो पूरी करनी थी। अगले दिन शाम को वह लड़का शराब पी कर और पत्थर लेकर घर के बाहर बैठ गया और हर आने जाने वाले लोगों को गालियां देता और पत्थर मारने लगा। एक दो दिन बाद लोग कहने लगे कि इससे तो इसका बाप ही अच्छा था गालियां तो देता था लेकिन पत्थर नहीं मारता था। इससे यह बात साबित होती है की समाज को गालियां (देने) वाला भी कुछ समय के लिए अच्छा कहलाया। इस लिए यह प्रार्थना है की रिश्तों में समाज से लेने ही न सीखे अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ ंदेते भी रहें ताकि हमें अपने बच्चों को यह न कहना पड़े की कुछ ऐसा करना की लोग हमें हमारे जाने के बाद भी याद रखें और अच्छा कहें।
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