वास्तु शास्त्र
वास्तु शास्त्र में आठ दिशाए होती हैं जिनमे चार मुख्य दिशाए होती हैँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। इसके अलावा चार कोणीय दिशाएं होती हैँ उत्तरपूर्व / ईशान कोण , दक्षिणपूर्व / आग्नेय कोण, दक्षिण पश्चिम / नैत्रक्या कोण और उत्तर पश्चिम / वायव्ये कोण। वास्तु शास्त्र में सभी दिशाओं का अपना अलग अलग महत्व होता है। प्रत्येक दिशा में अलग अलग गृह और देवता का वास होता है।
(पूर्व दिशा ) पूर्व दिशा का स्वामी सूर्य देव हैँ इस दिशा के देवता इंद्रा हैं यह दिशा हमें सुख समृद्धि, धन अच्छा स्वास्थय देती है। अगर मकान इस दिशा में कोई दोष हो तो घर के मुखिया के स्वास्थय पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और उसकी आयु में कमी होगी और इस दिशा में दोष होने पर ह्रदय, दांत, सिर और जीभ सम्बन्धी रोग हो सकते हैं अत मकान में इस दिशा को थोड़ा खुला रखना चाहिए ।
( पश्चिम दिशा ) इस दिशा के स्वामी शनि गृह पर देवता वरुण देव हैं यह दिशा जीवन में सफलता, प्रसन्ता और प्रसिद्धि प्रदान करती है। अगर इस दिशा में दोष हो तो मानसिक तनाव बना रहता है, किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती और पेट से सम्बंधित रोग हो सकते हैं। इस दिशा में भरी निर्माण करना चाहिए।
( उत्तर दिशा ) इस दिशा के स्वामी गृह बुध और देवता कुबेर हैं जो की धन के भी देवता हैं। यह दिशा बुद्धि, ज्ञान और धन के लिए शुभ होती है यह दिशा माता के सुख का भी प्रतीक मानी जाती है। इस दिशा में दोष होने पर दिल और छाती से सम्भंदित रोग हो सकते हैं इसलिए मकान मैं इस दिशा को थोड़ा खुला रखना चाहिए।
( दक्षिण दिशा ) इस दिशा के स्वामी गृह मंगल और देवता यम हैं यह दिशा यश,सफलता और धैर्ये के लिए शुभ होती है यह दिशा पिता के सुख का भी प्रतीक मणि जाती है। इस दिशा में दोष होने पर आत्मविश्वास में कमी हो सकती है और इस दिशा में पानी और शीशा नहीं होना चाहिए। मकान मैं इस दिशा मैं जितना भारी रखेंगे उतना लाभ होगा।
( उत्तर पूर्व / ईशान कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह बृहस्पति हैं इस दिशा से ज्ञान, धैर्य और साहस का सुख मिलता है इस दिशा से मानसिक और आर्थिक सम्पनता मिलती है इस दिशा में दोष होने पर गर्दन, कान और आँखों में कष्ट हो सकता है । मकान में इस दिशा को साफ़ सुथरा खुला और कम निर्माण करना चाहिए। इस दिशा में शौचालय और कूड़ा करकट नहीं रखना चाहिए।
( दक्षिण पूर्व / आग्नेय कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह शुक्र और देवता अग्नि है यह दिशा शयन, निंद्रा, काम और प्रजनन का सुख देती हैं। यह दिशा घर के सदस्यों को ऊर्जावान बनती है। इस दिशा में दोष होने पर बाई आँख, बाई भुजा और घुटनो में दोष हो सकता है इसलिए इस दिशा में पानी या पानी का टैंक कभी नै रखना चाहिए।
( दक्षिण पश्चिम / नैत्रक्या कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह राहु और देवता नैकरती नमक राक्षसनी है। यह दिशा सभी प्रकार की कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता, सही निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास प्रदान करती है इस दिशा में दोष होने पर अकाल मृत्यु, दुर्घटना, कैंसर, पोलियो, किडनी और पैरों में रोग हो सकते हैं। मकान में इस दिशा को कभी भी खाली नहीं रखना चाहिए। अगर इस दिशा में पानी का स्त्रोत हो तो जीवन में गरीबी बनी रहती है।
( उत्तर पश्चिम / वायवे कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह चन्दर और देवता पवन देव हैं। यह दिशा अच्छे सम्बन्ध, मित्रता, मानसिक विकास प्रदान करती है इस दिशा में दोष होने पर आँखों के रोग, पेट के रोग, अस्थमा और घर की महिला को रोग हो सकता है। इसलिए वायव्य क्षेत्र को ईशान क्षेत्र से नीचे नहीं रखना चाहिए।
ओम नमः शिवाय
वास्तु शास्त्र में आठ दिशाए होती हैं जिनमे चार मुख्य दिशाए होती हैँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। इसके अलावा चार कोणीय दिशाएं होती हैँ उत्तरपूर्व / ईशान कोण , दक्षिणपूर्व / आग्नेय कोण, दक्षिण पश्चिम / नैत्रक्या कोण और उत्तर पश्चिम / वायव्ये कोण। वास्तु शास्त्र में सभी दिशाओं का अपना अलग अलग महत्व होता है। प्रत्येक दिशा में अलग अलग गृह और देवता का वास होता है।
(पूर्व दिशा ) पूर्व दिशा का स्वामी सूर्य देव हैँ इस दिशा के देवता इंद्रा हैं यह दिशा हमें सुख समृद्धि, धन अच्छा स्वास्थय देती है। अगर मकान इस दिशा में कोई दोष हो तो घर के मुखिया के स्वास्थय पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और उसकी आयु में कमी होगी और इस दिशा में दोष होने पर ह्रदय, दांत, सिर और जीभ सम्बन्धी रोग हो सकते हैं अत मकान में इस दिशा को थोड़ा खुला रखना चाहिए ।
( पश्चिम दिशा ) इस दिशा के स्वामी शनि गृह पर देवता वरुण देव हैं यह दिशा जीवन में सफलता, प्रसन्ता और प्रसिद्धि प्रदान करती है। अगर इस दिशा में दोष हो तो मानसिक तनाव बना रहता है, किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती और पेट से सम्बंधित रोग हो सकते हैं। इस दिशा में भरी निर्माण करना चाहिए।
( उत्तर दिशा ) इस दिशा के स्वामी गृह बुध और देवता कुबेर हैं जो की धन के भी देवता हैं। यह दिशा बुद्धि, ज्ञान और धन के लिए शुभ होती है यह दिशा माता के सुख का भी प्रतीक मानी जाती है। इस दिशा में दोष होने पर दिल और छाती से सम्भंदित रोग हो सकते हैं इसलिए मकान मैं इस दिशा को थोड़ा खुला रखना चाहिए।
( दक्षिण दिशा ) इस दिशा के स्वामी गृह मंगल और देवता यम हैं यह दिशा यश,सफलता और धैर्ये के लिए शुभ होती है यह दिशा पिता के सुख का भी प्रतीक मणि जाती है। इस दिशा में दोष होने पर आत्मविश्वास में कमी हो सकती है और इस दिशा में पानी और शीशा नहीं होना चाहिए। मकान मैं इस दिशा मैं जितना भारी रखेंगे उतना लाभ होगा।
( उत्तर पूर्व / ईशान कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह बृहस्पति हैं इस दिशा से ज्ञान, धैर्य और साहस का सुख मिलता है इस दिशा से मानसिक और आर्थिक सम्पनता मिलती है इस दिशा में दोष होने पर गर्दन, कान और आँखों में कष्ट हो सकता है । मकान में इस दिशा को साफ़ सुथरा खुला और कम निर्माण करना चाहिए। इस दिशा में शौचालय और कूड़ा करकट नहीं रखना चाहिए।
( दक्षिण पूर्व / आग्नेय कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह शुक्र और देवता अग्नि है यह दिशा शयन, निंद्रा, काम और प्रजनन का सुख देती हैं। यह दिशा घर के सदस्यों को ऊर्जावान बनती है। इस दिशा में दोष होने पर बाई आँख, बाई भुजा और घुटनो में दोष हो सकता है इसलिए इस दिशा में पानी या पानी का टैंक कभी नै रखना चाहिए।
( दक्षिण पश्चिम / नैत्रक्या कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह राहु और देवता नैकरती नमक राक्षसनी है। यह दिशा सभी प्रकार की कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता, सही निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास प्रदान करती है इस दिशा में दोष होने पर अकाल मृत्यु, दुर्घटना, कैंसर, पोलियो, किडनी और पैरों में रोग हो सकते हैं। मकान में इस दिशा को कभी भी खाली नहीं रखना चाहिए। अगर इस दिशा में पानी का स्त्रोत हो तो जीवन में गरीबी बनी रहती है।
( उत्तर पश्चिम / वायवे कोण ) इस दिशा के स्वामी गृह चन्दर और देवता पवन देव हैं। यह दिशा अच्छे सम्बन्ध, मित्रता, मानसिक विकास प्रदान करती है इस दिशा में दोष होने पर आँखों के रोग, पेट के रोग, अस्थमा और घर की महिला को रोग हो सकता है। इसलिए वायव्य क्षेत्र को ईशान क्षेत्र से नीचे नहीं रखना चाहिए।
ओम नमः शिवाय

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